वसंत गीत
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ऋतुराज वसंत*
आयो ऋतुराज सैन्य फूलों के संग ,
हिय में हुलास नव -पल्लव डोलत है ।
शीत के मीत गयो शीत के बिछावन,
विहग करत केलि , भ्रमरन खेलत है ।।
सरस बयारि भाव तन मन चंग ,
मधुप गुंजार लाल टेसू झूलत है।
देखो रसाल बीच मंजरि के आवन से
नेह टपकत रस प्रेम में घुलत है ।।
पुहुप की डलियन में प्रणय रंग ,
मान रखे जग में व्यापत दिखत है।
रसहिं तुरन, जोग धावत बेग धरि,
तूरत वसंत ताहि वाको इहां भंग है ।।
खेतों में शोभें पीत सरसों के अंग ,
शिशिर हेमंत बाद आवत वसंत है ।
धरनी के आंगन में बात जग माने है
कहत कवि जन ऋतुओं का कंत है ।।
*मोहन पाण्डेय 'भ्रमर '
हाटा कुशीनगर उत्तर प्रदेश
मोबाईल 9793070189
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