भोजपुरी

बात कजरी की'तो बता दें कि कजरी उप्र के मिर्जा पुर के इलाके में परम्परागत रूप से गाई जाने वाली विधा है। वैसे पूर्वी यूपी व बिहार में लोग जरूर पसंद करते हैं। सावन कजरी जरुर गाते हैं। जानकारों के मुताबिक कजरी एक विरहिणी थी जिसके नाम से चौमासे में एक विशेष गीत गाने की शुरुआत हुई।
कजरी में यह आभास होता है कि हम पूरी तरह अपनी माटी की गोद में बैठकर एक हकीकत का चित्र देख रहे हैं। सचमुच कजरी ग्रामीण जीवन का एक चित्र है। यही कारण है कि हिंदी के उन्नायक भारतेंदु जी ने भी कजरी लिखकर इस विधा का मान बढाया।
ननद भउजाई के सवाल जवाब से विंधी एक कजरी =

कईसे खेलन जईबू सावन मां कजरिया
बदरिया घिरि आई ननदी
हम ते खेले जईबे भउजी कजरिया
बदरिया चाहे बरसी भउजी
तूं त जात हउ अकेली
केहू संग ना सहेली
छैला रोक लैहें तोहरी डगरिया
  बदरिया - - - -

--------------क्रमशः

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