भोजपुरी
भोजपुरी के विकास में लोकगायकों के योगदान पर चर्चा हो और सम्मानित मालिनी अवस्थी जी की चर्चा न हो यह हो ही नहीं सकता। अवस्थी जी उत्तर प्रदेश के कन्नौज में 11 फरवरी 1967को जन्मी और ईश्वरीय देन के रूप में अपने माटी की बोली में गीत गाने की प्रतिभा मिली। बनारस की शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी का शिष्य होने का गौरव प्राप्त हुआ। इन्हें भी कई देशों में भोजपुरिया महक विखेरने का अवसर मिला। हिंदुस्तान में भोजपुरिया समाज इनके गीत का कायल है। यही नहीं पाकिस्तान में भी इनके गीतों की बड़ी मांग है। मालिनी जी ने हमेशा अश्लील गीतों का बहिष्कार किया है भोजपुरी को इनके द्वारा सम्मान दिलाने में यह भी एक प्रमुख कारण है। अवधी बुंदेली भोजपुरी में गीत गाने में सिद्ध हस्त हैं। कजरी व ठुमरी में तो कुछ कहना ही नहीं। इनके भोजपुरी सेवा का ही फल है कि भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया स न् 2016 में। शुरू करते हैं इनके कजरी पर विचार =
=कजरी पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार में सावन में गाया जाने वाली एक विधा है जब बादल घिरे तो समझो सावन है प्रवासी भारतीयों की गृहिणियों की पीड़ा =
रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे
जउने टिकटवा से बलमा मोरे जईहे
पानी बरसे टिकट गलि जाई रे
हांलाकि यह एक विरहिणी की पीड़ा आजादी के पहले भी गाया जाता था लेकिन मालिनी जी की प्रस्तुति ने
पीड़ा को पुनः समझने की कोशिश की है और काफी हद तक लोक में संदेश देने में कामयाब रही हैं।
इस गीत की अगली कड़ी और भी ह्रदय स्पर्शी है =
जवने शहरिया को पिया मोरे जईहे
आगि लगे शहर जरि जाए रे। रेलिया बैरन____
जवने सहबवा के सईयां मोरे नोकर
गोली दागे साहेब मरि जाए रे।
रेलिया बैरन - - - - - - - - - - - - - -
लोक की पीड़ा का मरम और उसे लोक भाषा में उतारने में अवस्थी जी सफल रही है
----------------------्क्रमशः
Comments
Post a Comment