भोजपुरी निर्गुण क्रमशः(गतांक से आगे)
भोलानाथ गहमरी ने एक बहुत प्रभावशाली निर्गुण लिखा है जिसे आकाशवाणी गोरखपुर ने कई बरसों तक प्रसारित किया। मोहम्मद खलील के द्वारा गाया गया।
ईस गीत को अनेक आयोजनों में प्रस्तुतभी किया गया।
यह गीत आज भी भोजपुरी इलाके में लोगों के जेहन में बसा हुआ है लोग मोहम्मद खलील के इस निर्गुण को सुनने के लिए आकाशवाणी के कार्यक्रम का बेसब्री से इंतजार करते थे।
*****कवने खोतवा में लुकईलू आहि रे बालम चिरई।
वन वन ढूंढलीं दर दर ढूंढलीं ढूंढलीं नदी के तीरे
सांझ के ढूंढलीं रात के ढूंढलीं ढूंढलीं होत फजीरे
जन में ढूंढलीं मन में ढूंढलीं ढूंढलीं बीच बजारे
हिया हिया में पईसि के ढूंढलीं ढूंढलीं बिरह के तीरे
कवने अतरे में समीईलू आहि रे बालम चिरई।।
गीत के हम हर कड़ी में पूछलीं पुछलीं राग मिलन से
छंदछंद लय ताल से पुछलीं पुछलीं नील गगन से
कवने सुगना पर लोभईलू आहि रे बालम चिरई
मंदिर से मस्जिद तक देखलीं
गिरजा से गुरूद्वारा
गीता और कुरान में देखलीं
देखलीं तीरथ सारा
पंडित से मुल्ला तक देखलीं
देखलीं घरे कसाई
सगरी उमरिया छछलत जियरा कईसे तोहंके पाई
कवने बतिया पर कोहंईलू आहि रे बालम चिरई
लेखक
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मोहन पान्डेय
प्राध्यापक हिन्दी। श्री नाथ संस्कृत महाविद्यालय हाटा कुशीनगर उप्र
अन्य =पत्रकारिता एवम् लेखन
जन्म स्थल =हरखा प्यास, जनपद महराजगंज उप्र
इन्डिया
कृपया अपना सुझाव जरुर दें
ReplyDeleteप्रथम पंक्ति में भोला राम गहमरी पढा जाय
ReplyDeleteआकवाणी गोरखपुर से यह गीत मोहम्मद खलील ने गाया
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