कजरी (क्रमशः (भोजपुरी साहित्य )

लोकगायन के परम्परा में वर्तमान में बिहार की माटी की बेटी शारदा सिन्हा का नाम प्रमुख पंक्तियों में रखा जाता है। क्योंकि वे केवल भोजपुरी अंचल ही नहीं एक क्षेत्र विशेष की नहीं भारतीयता की गायिका हैं। कजरी भोजपुरी पर्व गीत संस्कार गीत देवी गीत आदि तमाम विधाओं के माध्यम से लोक मनोरंजन कर रही हैं। साथ ही भोजपुरी साहित्य को पूरे देश में फैला रही है यह अपने भाषा की निजता कायम रखने व प्रतिष्ठा स्थापित करने   में बहुत बड़ा योगदान है। बिहार व यूपी में जन जन के आस्था का पर्व छठ है। इस पर्व का अनेकों गीत उन्होंने मंचों के द्वारा व कैसेट के द्वारा जन जन के बीच संचारित कर रही है। इन्हें पूरी तरह लोक का बोध है और भोजपुरी पर आधुनिक प्रहार को रोकने में वे काफी सफल हो रही है क्योंकि जब भाषा प्रयोग में होती है तो बलवती होती है इसका पूरा आभास इन्हें है
क्योंकि =जिन्दा रहने के लिए, जिंदा रहना जरूरी है।
का पूरा दर्शन सिन्हा जी के चिंतन में परिलक्षित होता है

तभी तो इन्हें बिहार सरकार ने बिहार कोकिला से सम्मानित किया और पद्मश्री से भी नवाजा गया।

प्रकृति व मानव के बीच मधुर प्रेम का रस से सराबोर गीत लोगों के मन को अनायास ही आकर्षित कर लेता है
=अमवां महुअवा के झूमे डरिया
तनि ताक न बलमुआं हमार ओरिया
==++++=======++++++++++
प्रेम की अभिब्यन्जना+++=
पिरितिया काहें ना लगवल
बेकल जीया रहलो न जाय

कोठा उठवल कोठरिया उठवल
पिरितिया काहे न लगवल
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इतना ही नहीं सिन्हा जी के भोजपुरी क्षेत्रों में सभी आयोजनों में इनके गीत न बजे तो शायद महफिल का रंग अधूरा दिखता है। दुल्हिन, पिरितिया, मेंहदी नाम के भोजपुरी गीत के कैसेट की बिक्री बाजारों में खूब है

भाई, दगाबाज बलमा, गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो, सोहागन बना द सजना आदि भोजपुरी फिल्मों में इनके गीतों को दिल से पसंद किया गया।
क्रमशः ====
छठ के गीत तो शारदा सिन्हा ने इतना दिया है कि माताएं छठ पूजा के पावन पर्व पर उनके गीतों में डूब जाती है
*, *==कांच ही बांस के बहंगियां
         बहंगीं लचकत जाय।
        होईं ना बलमु जी सहईया
        बहगीं घाटे पहुंचाई।
होईं ना देवरजी सहईया
दउरा घाटे पहुंचाई______--------
***********पटना के घाट पर देबे हमहूँ अरघिया
                      हे छठि मईया।।
हम ना जाईब दुसर घाट
                                हे छठि मईया।।
केला सेव नारियल कीने गईलीं बजरिया
ओसे ही लागल बडी देर हे छठि मईया।।
फूल लेले ठाढ़ बाडें मलिया मलिनियां
देखब   हे छठि मईया।
ओहि फूले हरवा गूंथाई
देखब हे छठि मईया।।

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केलवा के पात पर उगेलें सूरजमल

झांके_झूके
हे करेलू छठ बरतिया
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     ईस प्रकार हम देखते हैं कि लोकगायक पन्ने दर पन्ने पर झांकते हुए उसे संजोने में लगे हुए हैं
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