हिंदी साहित्य में निर्गुण काव्य धारा( भोजपुरी)
हिंदी साहित्य में निर्गुण काव्य धारा की पैठ समाज में काफी गहराई तक है। भारत के गांव में सदियों से निर्गुण के प्रति अनुराग रहा है। जब माया के जाल से ऊबा मनुष्य आत्मा और परमात्मा के बीच की गहराईयों में खोता है तो इस तरह की रचनाओं से उसके मन को निश्चित तौर पर सुख मिलता है। कबीर जी के निर्गुण साधना के फलस्वरूप तमाम रचनाओं का दर्शन हुआ लेकिन भोजपुरी या यों कहें कि देशज भाषा में पूरे देश में ईस भाव के गीत मानव सभ्यता के विकास के साथ ही शुरू हुए भले ही वे पूरी तरह समृद्ध न रहे हों।
हमारे भोजपुरी रचनाओं को लोककलाकारों ने खूबसूरती के साथ आमजन के बीच फैलाया।
देखें रमाशंकर यादव का निर्गुण
काहें माया में भुलाइल बाड़ तोता हो
कि खोता छोडि के जाएके पडी।
उडि जाई सुगना लवटि के ना ताकी।
कहां बाडें भाई बंधु कहां बाडी काकी
राजा रंक होईहें चहे हरजोता हो
खोता छोडि के जाए के पडी
====निर्गुण के माध्यम से उन्होंने मनुष्य को यह संदेश देने की कोशिश की है कि सब कुछ माया के अनुसार ही
होता है अपने मोक्ष की कोशिश करो। निश्चित रूप से यादव अपने संकल्प में सफल होते दिखते हैं।
इसी तरह विष्णु ओझा निगम ने भी एक से बढ़कर एक निर्गुण समाज के बीच दिया ===
सांचे सांचे बतिया कहीले संघतिया
संझवा ले गुन सुनाईं हे राम
सुतले में रहलीं अपने भवन में
घरवा में चोरवा आईल हे राम?
आहट पाई के बोलल चहलीं
मुंहवां से कुछु ना बोलाईल हे राम
धन जन तन तीनू कुछउ न छुअलसि
संहें सुगना लेके पराईल हे राम
होखल भोरे अंजोर जब भईल
घर परिवार बटुराईल ए राम।
खाली पिंजरा बंद केवाडी देखि
सबकर नैन भराईल ए राम।
मनुष्य के व्यथित मन को आध्यात्मिक ज्ञान के रूप
रस से सराबोर करने में निर्गुण काव्य धारा के रचनाकारों व गायकों का कीमती योगदान है।
======क्रमशः
निर्गुण गांव गिरांवं खेत खलिहान फुर्सत के क्षणों में हमारे भाई लोग परम्परा से ही गुनगुनाते दिख जाते हैं। आध्यात्मिक रूप से मन को शांति मिलती है और काका काकी दादा दादी सभी को पसंद भी आता है।
इस क्षेत्र में अनेक गायकों को अच्छी प्रसिद्धि भी मिली है। पं भरत शर्मा को नब्बे के दशक में निर्गुण ने अच्छी प्रसिद्धि दिलाया। हालांकि कुमार गंधर्व ने इसकी महत्ता को देखते हुए इसे शास्त्रीय संगीत के रूप में स्थापित किया है।
==क्रमशः *******,,,,
निर्गुण के माध्यम से मनुष्य को आत्मिक शांति दिलाने में निर्गुण गायकों का अहम् योगदान है। वह भी इसलिए कि इन लोगों ने लोकभाषा में निर्गुण का संचार किया और आज भी अनवरत जारी है। एक खास बात जरूर देखने को मिलता है कि निर्गुण अपने मूल प्रवृत्ति से आद्यांत कभी नहीं भटका। ईश्वरीय चिंतन या अध्यातमवाद ही रहस्य है और इसी का गूढ़ रुप निर्गुण। कबीर ने जिस रहस्य को प्रतिपादित किया अनवरत जारी है सर्वकालिक है तभी तो आज भी लोकभाषा में जीवंत है। तभी तो वे कहते हैं =
जल में कुम्भ कुम्भ में जल है
भीतर भीतर पानी
टूटा कुम्भ जल जल में समाना
यह तथ्य कह्यो ज्ञानी है।
यह सत्य है कि कबीर निर्गुण ब्रह्म के उपासक है फिर भी वे सगुण राम को अपने चिंतन से दूर नहीं करते लेकिन रहस्य यह है कि उनके राम अवतारी राम नहीं सवॅ व्यापी हैं =दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना
राम नाम का मर्म न जाना।
निर्गुण चर्चा में कबीर साहब की चर्चा करना इसलिए प्रासंगिक है कि निर्गुण पंथ की चर्चा उनके बिना अधूरी है
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