(भोजपुरी के विकास में_------लोकगायकों का योगदान। गतांक से आगे -_--
लो क में किसी भी भाषा के जीवंत रहने व जन जन में उसके प्रति आस्था व लगाव तभी रहता है जब जीवन के हर क्षेत्र में उसका प्रयोग किया जाता है। लोकगायकों ने माटी की संस्कृति को अपने गीतों में पिरोकर जन जन को इसके प्रति आकर्षित करने के साथ ही साथ समाज को समयानुसार नई दिशा भी प्रदान किया है। इन गीतों के माध्यम से तमाम उपदेश, सुख दुख सहने की शक्ति, बुरे मार्ग से बचने की सलाह, रीति रिवाज परम्परा देश प्रेम प्रकृति प्रेम आदि क्षेत्रों में अपनी साधना के द्वारा लोक व देश सभी का भला करने का योगदान दिया है।
एक लोकगीत जिसे देश के किसानों को प्रेरणा देने के लिए गाया गया ===
*फूटलि किरिनियां से विहसंल सिवनवां
होला सुहावन विहनवां
जाग देशवा के किसनवां।।
एक और ऐसा ही प्रेरणा गीत दो दशक पहले बहुत प्रचलित था
**
हीरा मोती फरे मोरे हरवाही मितवा।।
भोजपुरी के विकास में भोजपुरी बिरहा के लोकगायकों ने भी अपना अमूल्य योगदान दिया और आज भी दे रहे हैं। बिरहा के उन्नायकों में बिहारी गुरू का नाम सबसे पहले आता है। हीरा लाल यादव रामदेव यादव बुल्लू यादव के बिरहा ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो अपनी धूम ही मचा दी। भोजपुरी की बिरहा विधा ऐसी विधा है जिसमें महिला समस्या महिला सशक्तिकरण ग्रामीण जीवन की समस्या व धर्म एवं राजनीतिक समस्याओं का जोरदार समावेश रचनाकारों ने किया और वह भोजपुरी बोली के सतत विकास में आज भी जारी है यही नहीं तमाम युवा तथा बालिकाओं का भी पदार्पण इस गायन में हुआ है। बिरहा खासकर आजमगढ़ जौनपुर बलिया गाजीपुर गोरखपुर देवरिया क्षेत्रों में खास पसंद है और एक से बढ़कर एक गायक इसी मिट्टी से पैदा हुए और भोजपुरी बिरहा के माध्यम से भाषा की सेवा कर रहे हैं। हीरालाल यादव का हृदय स्पर्शी जौनपुर कांड बिरहा ने लोगों को काफी प्रभावित किया और उन्हें अच्छी प्रसिद्ध मिली
जिसकी एक मार्मिक पंक्ति है_ससुररिए में दुलहा घेराई गईले ना।____-_===================+===
****,,,, *****बिहार की पुष्पा राजन ने बिरहा गायन के माध्यम से भोजपुरी के विकास में अप्रतिम योगदान दिया है। और इसी विधा में हैदर अली ने भी अपने बिरहा के गायन में भोजपुरी को अपनाया और इस भाषा को जन जन में पहुंचाने का अच्छा प्रदर्शन किया। सती सुलोचना के विषाद का मार्मिक प्रस्तुति भोजपुरी बिरहा में किया। प्राचीन काल से ही हमारा समाज जीव जंतु पेंड़ पौधों व अन्य प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति आकर्षित रहा है। दादा दादी की कहानियों में इनसे जुड़े प्रसंग सभी को भाते रहे हैं। तमाम भोजपुरी गायकों ने अपने गीतों में इन विषयों को अपने प्रस्तुति का केंद्र विंदु बनाया। जयप्रकाश पाल ने बिरहा के माध्यम से एक गीत दिया **सियार सियारिन का विवाह **जो रूचिकर है और जन जन के समझ के लायक है।
**अभय कृष्ण जी ने एक सामयिक गीत दिया जो माटी के प्रेम का अनूठा उदाहरण है =
** डोले बसंती बयार मगन मन होला हमार
गेहुंआं मटरिया से लहरल सिवनवां
होखे निहाल भईया सगरे किसनवां
धरती के बाढ़ल ऋंगार, मगन मन होला हमार
विहंसेला फुलवा महकेला क्यारी
तांक झांक भंवरा लगावे फुलवारी
मौसम में आईल बहार
मगन मन होला हमार।।
आईल कोयलिया अमवां के डरिया
सोहेला पनघट किनार।
मगन मन होला हमार - - - - - - ।
******, ***,,,,, भोजपुरी भाषा के विकास को गति देने में भोजपुरिया सिनेमा के निर्माताओं ने भी असीम योगदान दिया है। पहली भोजपुरी फिल्म हे गंगा मैया तोहें पियरी चढइबों जिसके निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी रहे "में एक सारगर्भित गीत दिया रफी जी की आवाज में =सोनवां के पिंजरा में बंद भइल हाय राम
चिरई के जियरा उदास
टूटि गइलें डलिया छितरि गइलें खोतवा
टूटि गईल नील रे अकाश।
छल छल नयना निहारे चुप चिरई
चललीं विदेशवां रे मईया के दुलरूई
अंसुआ के मोतिया निशानी मोरे बाबुला
धरि गईलीं हम तोहरे पास।
बिलखति रहि गईलि संग के सहेलिया
ले गईल बांध के निठूर रे बहेलिया
मोरे मन मितवा भुला दे अब हमरा के
छोडि दे मिलन के तूं आस। ********×*********************
गोरखपुर उत्तर प्रदेश के मनोज मिहिर भी पूरब की मीठी भोजपुरी भाषा में समसामयिक व भक्ति गीतों के माध्यम से लोक मनोरंजन तो कर रहे हैं लोक साहित्य को जीवंत व शिखर पर पहुंचाने वाले लोक गायकों की मुख्य पंक्ति में अपना प्रमुख स्थान बना चुके हैं। अनेक समस्याओं को विविध विधाओं के माध्यम से लोकरंजक प्रस्तुति से भोजपुरी का निरंतर विकास हो रहा है इसमें कोई शक नहीं है।।।।।।।।। भोजपुरी अंचल के दिनेश लाल निरहुआ भी अपने भोजपुरी भाषा के साधना में काफी लोकप्रिय हुए गांव में उनके गीत हर वय के लोग गुनगुनाते मिल जाते हैं।
कुशीनगर की पावन धरती पर जन्मे रामदरश शर्मा भी भोजपुरी भाषा में अपने लोकगीतों के माध्यम से लोक मनोरंजन कर रहे हैं। उनके गीतों में समाज की गंभीर समस्याओं सामाजिक कुरीतियों प्रकृति का सुंदर चित्रण एवम् राजनीतिक परिदृश्य का आकर्षक चित्रण दिखाई देता है। भोजपुरी माटी का यह लाल भाषा के विकास व संस्कृति विविध रूपों का लोक दर्शन के सतत प्रयास में लीन है। समाज के तमाम अनछुए व गंभीर विंदुओं को समाज के सामने अपने गीतों के माध्यम से पेश करने में इन्हें कोई गुरेज नहीं है गांव व गांव की माटी इनके गीतों के केंद्र विंदु है भोजपुरी भाषा के विकास में इनका सतत प्रयास सराहनीय है।
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