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  1. इक्कीसवीं सदी भारतीय लोकतंत्र के लिए निश्चित रूप से एक चुनौती के रूप में है। तमाम राजनीतिक उथल-पुथल और सामाजिक समस्याओं का सामना देश को करना पड़ा और वर्तमान में भी समस्याओं की भरमार है। अस्सी के दशक से शुरू हुआ आतंकवाद अभी समाप्त नहीं हुआ रक्तबीज के तरह आतंकवादी उत्पन्न हो रहे हैं। काश्मीर में अलगाववादी देश की अखंडता के लिए चुनौती बन गए हैं अपने ही भाई अपने भाइयों को मार रहे हैं। पत्थर चला रहे हैं। आज जरूरत है भारत माता के सपूतों को एकजुट होकर लोकतंत्र को मजबूत करने की। जय हिंद

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  2. आधुनिक समय में इसी तरह के विचारोत्तेजक लेख के लिए फालो करें

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  3. बिगड़ता पारिस्थितिकि तंत्र चिंता का विषय
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    देश की आजादी के बाद जब पंचवर्षीय योजना के माध्यम से देश के विकास पर जोर दिया गया तो उसके बाद पर्यावरण संरक्षण व पारिस्थितिकि संतुलन पर देश को सोंचना पड़ा। देशी तकनीकी धीरे-धीरे विस्थापित होती गई औद्योगिक क्रांति के बाद तमाम कल कारखाने खुले आबादी के जरुरत के लिए हर सुविधाएं प्रोडक्ट के रूप में उपलब्ध होने लगी औद्योगिक विकास ने बहुत कुछ दिया तो बहुत कुछ लिया भी। औद्योगिक उत्पादन के कारण तमाम लोगों को बेरोजगार भी होना पड़ा। धरती के शोभा पेड़ों के सर्वनाश का सिलसिला जारी है। वातावरण संतुलन बिगड़ गया है। कभी गर्मी कभी बारिश कभी बाढ़ सूखा सागरीय तूफान अपना कहर ढा रहे हैं यह सब बेमौसम होता है। ग्लोबल वार्मिंग एक प्रमुख समस्या बना हुआ है। भू तंत्र अपना स्वरूप खो रहा है। प्राकृतिक बनस्पतियो के अभाव में धरती अनुत्पादक होती जा रही है। जलीय संरचना बिगड़ने के कारण तमाम तरह की संरचनाओं का अस्तित्व खतरे में है। यही कारण है कि तमाम जीव जंतु विलुप्त होने के कगार पर है। इसका सही निदान पर्यावरण संरक्षण, जीव जंतुओं का संरक्षण, जल संरक्षण, एवम् हानिकारक रसायनों के प्रयोग न करने जैसे उपाय है इसके लिए हम सभी को आगे आना होगा।

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