चम्पारण आन्दोलन का तात्कालिक प्रभाव (शताब्दी बर्ष पर विशेष)

जब देश अंग्रेजी हुकूमत की दासता से कराह रहा था और एक से एक नौजवान भारत माता को आजाद कराने के लिए अपनी कुर्बानी दे रहे थे दूसरी तरफ मोहन दास करमचंद गांधी व्यावसायिक सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए थे वहां मौजूद भारतीयों की दुर्दशा देखकर द्रवित हो उठे और उनके मौलिक अधिकारों की लड़ाई लडी भारतवंशियों को विजय मिली। सत्य व अहिंसा का जो प्रयोग दक्षिण अफ्रीका दक्षिण अफ्रीका में किया उस प्रयोग की अनुभूति ने उनके मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ी
। स्वदेश वापसी के बाद उन्हें देश से पूर्णतः परिचित होना था देशव्यापी यात्राएं शुरू हुई। लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में चम्पारण (बिहार) के कुछ किसानों ने पहुंचकर बताया कि अंगेजों के पिट्ठू जमींदारों द्वारा किसानों से जबरन नील की खेती कराई जाती है तीनकठिया प्रथा से किसान त्रस्त हैं । अनेक तरह के कर वसूली की जाती है। गांधी जी ने किसान राजकुमार शुक्ल की बात को बहुत गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि उस समय आजादी की लड़ाई प्रमुख थी। किन्तु शुक्ल जी कानपुर भी पहुंचे और गांधी जी के पीछे पीछे कलकत्ता तक पहुंच गए। तब गान्धी जी को उनके साहस को देखते हुए अप्रैल 1917मे चम्पारण जाना पड़ा। पन्द्रह अप्रेल को पहुंचने के बाद वहाँ की परिस्थितियों को देखते हुए गंभीर निर्णय लिया 17अप्रैल को हजारों किसानों के साथ आंदोलन हुआ अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा काला कानून वापस हुआ तिनकठिया प्रथा समाप्त हो गई। महात्मा चम्पारण की जनता के हृदय में बस गए। बरसों तक चम्पारण में शिक्षा स्वास्थ्य व सफाई पर कार्य हुआ। चम्पारण का नाम पूरे देश में फैल गया गान्धी भी देश की राजनीति के शिखर पर पहुंच गए सत्य व अहिंसा की यहां भी विजय हुयी थी और इसके आगे पूरे देश में कई अध्याय बनने थे। गांधी जी ने चम्पारण का उद्धार किया था। आंदोलन के सौ साल की याद में पूरे बिहार में चम्पारण आन्दोलन शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है यह उस महान आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि है और सत्य अहिंसा की ज्योति की मशाल आगे ले जाने का सतत प्रयास। बहुत सी ऐतिहासिक क्रान्तियां बिहार की पवित्र धरती से हुई ज्ञान की ज्योति भी भगवान् बुद्ध ने इसी पवित्र धरा से मानव कल्याण के लिए पूरे विश्व में फैलाया। शताब्दी साल पर बापू को शत शत नमन। कि चम्पारण आन्दोलन से वहां की जनता को एक नई चेतना व उर्जा तो मिली ही आंदोलन ने राष्ट्रीय क्षितिज पर महात्मा को नयी पहचान दिलाई जो आगे चलकर बहुत कारगर साबित हुई।

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