भोजपुरी (गतांक से आगे)
भोजपुरी भाषा के विकास में तमाम लोकगायकों द्वारा
अप्रतिम योगदान दिया जा रहा है। जो सात समंदर पार जाकर भोजपुरी माटी की महक फैला रहे हैं।
भोजपुरी लोकसंगीत के पारंपरिक विधा को अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा बना लिया उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के भलुअनी से तीन किलोमीटर दूर स्थित करौंदी गांव की पवित्र माटी में जन्मे पं राकेश उपाध्याय ने। स्व कैलाश उपाध्याय के पुत्र होने का गौरव प्राप्त हुआ। हाईस्कूल में अध्ययन के दौरान 1986से उनके मन में माटी की बोली भोजपुरी संगीत के प्रति लगाव हुआ। धीरे-धीरे यह यात्रा शुरू हुई गांव के लोक त्योहार व कीर्तन आदि आयोजनों से। 1989मे आकाशवाणी गोरखपुर में लोकगीत के लिए चुना गया और आज भी प्रस्तुति दे रहे हैं। उन्होंने अपनी माटी की महक फैलाने डरबन बैंकाक मस्कट व हॉलैंड में शानदार प्रस्तुति कर वहाँ के लोगों का दिल जीत लिया। अपने देश में मेघालय पटना सहडोल ताज महोत्सव आगरा लखनऊ व विश्व भोजपुरी सम्मेलन दिल्ली में अपनी लोकप्रिय प्रस्तुति दे चुके हैं
वे खुद कहते हैं =भोजपुरी लोकसंगीत में पारंपरिक विधा इतनी धनी है कि इसमें किसी नमक मिर्च की गुंजाइश ही नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु तक सारी कला सिखा देती है। मैंने माटी की बोली की साधना व विकास का रास्ता इसलिए चुना कि **यह अपनी मां है और मां को छोडकर बेटे का अस्तित्व नहीं, मुझे इसी से तृप्ति होती है *
सोहर
*****,, गइया के गोबरा मंगाइले
चौका लिपाइले हो
मोरे राम जी के भइले जनमवां
ते सोहर गाइले हो।।।
जनकपुरी में उद्यान में राम लक्ष्मण को देखकर जानकी
जी की सखियाँ जो भाव प्रकट करती है उसे संजोया है
=सुंदर सहेली रूप राघो के मूरतिया
हे सहेलिया मोरी रे
निरखत नयना ना अघाय
हे सहेलिया मोरी रे।
अनेक विषयों पर भोजपुरी में अपनी साधना कर उपाध्याय जी भोजपुरी भाषा की श्री वृद्धि कर रहे हैं
प्रनाम भईया जी रउरी लेखनी के हम नमन करत बानी
ReplyDeleteआपन मोबाइल नम्बर देइँ
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