चम्पारण सत्याग्रह
अफ्रीका से वापस आने के बाद मोहन दास करमचंद गांधी ने देश की परिस्थितियों को समझने में अपना कीमती समय देना शुरू किया।
1917के कांग्रेस अधिवेशन लखनऊ में चम्पारण विहार के किसान पं राजकुमार शुक्ल ने आग्रह किया कि चम्पारण के किसानों पर हो रहे अन्याय को दूर करने के लिए आप वहाँ चलें। चम्पारण नेपाल से सटा हुआ देश का सीमावर्ती प्रदेश है जहां की धरती मनमोहक वनों से आच्छादित थी। पवित्र नदियों से सिंचित धरा अपनी सुंदरता व उर्वरता में भी शीर्ष स्थान रखती है। कलकत्ता पहुंच कर गांधी जी चम्पारण की यात्रा की जहाँ बाबू राजेंद्र प्रसाद जेबी कृपलानी जैसे मनीषियों का भरपूर सहयोग मिला उम्मीद से कहीं ज्यादा समस्या देखकर गान्धी जी ने आंदोलन की जो दिशा तय किया उससे अंग्रेजी सरकार विवश हो गई और नील की जबरन खेती बंद हुई तमाम कर समाप्त हुए। गांधी जी चम्पारण के लोगों के दिल में बस गए। सत्याग्रह की विजय के बाद एक से बढ़कर एक आंदोलन हुए लेकिन चम्पारण सत्याग्रह आंदोलन ने देश को एक दृढ़ संकल्प व मजबूत सत्याग्रह का देवता दिया और वास्तव में वे महात्मा के रूप में स्थापित भी हो गए। 2017चम्पारण सत्याग्रह आंदोलन का शताब्दी बर्ष है चम्पारण की पवित्र धरती व महात्मा को शत् शत् नमन यह आंदोलन सदियों तक प्रेरणा देता रहेगा
पहली पंक्ति में मोहन चंद के जगह मोहन दास पढें। लिखने में भूल के लिए खेद है
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