अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य
दो हजार सत्रह के पांचवें महीने में मैंने एक लेख लिखा था कि तीसरे विश्वयुद्ध के तरफ बढ़ रही दुनिया। तब नार्थ कोरिया की सैन्य गतिविधियों में काफी तेजी देखी गई और पूरा विश्व इस मसले पर सोंचने को मजबूर हो गया था। फिर भी केवल नार्थ कोरिया ही एक बहाना नहीं है आज तमाम वैश्विक परिस्थितियां सामने आ रही है सीरिया के बहाने अब एक और समस्या सामने आ रही है कुछ शक्तिशाली देशों के अलग अलग गुटबंदी और हमले कभी भी अपना खतरनाक असर छोड़ सकते हैं जिसका परिणाम काफी विनाशकारी साबित हो सकता है। तमाम देशों के पास खतरनाक आयुध भी जमा हो गए हैं जिनसे विनाश के अलावा मानवहित हो ही नहीं सकता है। शीत युद्ध की बात को पीछे छोड़ दुनिया नए मोड़ पर खड़ी है सभी देशों को विनाश को छोड़कर सृजन पर अग्रसर होना चाहिए यह संसार के हित में होगा
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