बारूद और बंदूक से नहीं दबतीं विचारधाराएं

 

बारूद और बंदूक से नहीं दबतीं विचारधाराएं
*मोहन पाण्डेय
*शिक्षक, साहित्यकार, पत्रकार

 अफगानिस्तान की धरती पर बीस साल तक फौजी कारर्वाई
और आतंक के सफाए को लेकर संघर्ष कर रहे अमेरिका को
अंततः वापस जाना पड़ा।वह भी प्रत्यक्ष रूप से अपनी मर्जी से नहीं।जिस आतंक के सफाए के लिए उसकी भारी भरकम फौज सहयोगी देशों के साथ लम्बे समय तक अफगानिस्तान में डंटी थीं।बहुत ही शर्मनाक तरीके से वापस जाना पड़ा।31अगस्त तक का समय जो उसने मुकर्रर किया था उसे तालीबान ने लक्ष्मण रेखा मान लिया और अडिग हो गए कि जाना है तो जाना है।बीस साल बाद मुकर्रर तिथि से बीस घण्टे पहले ही उसने अलविदा कह दिया और अफगानिस्तान की धरती पर तालीबानी तड़तड़ाहट ने अपने संदेश को पूरे विश्व में पहुँचा दिया।हालांकि कि तालीबानी नेताओं के साथ दोहा में बैठकें भी हुई और यह आंतरिक मामलों के कारण अंदरुनी ही रहीं कुछ खास बाते विश्व मंच पर नही आयीं।यह कैसे मान लिया जाय कि विश्व में एक महाशक्ति के रूप में विख्यात अमेरिका मुट्ठीभर लोगों से इतनी बडी़ डील कल लेगा और एक कठोर फैसला लेते हुए वतन की वापसी कर लेगा।विश्व में बढ़ती आतंकी घटनाओं और आतंकवाद के सफाए का दम्भ भरने वाले देशों में अग्रणी अमेरिका के सामने कौन सी ऐसी मजबूरी आ खड़ीं हुई कि जिस खूंखार आतंकवादी संगठन की मिट्टी पलीत करने की कसम खाकर बीस साल तक अफगानिस्तान में अमन चैन कायम करने की कोशिश की और एक जनप्रिय सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई? आधुनिक अफगानिस्तान के निर्माण में बीस साल कम नहीं होते हैं वहाँ विकास और समाज का नया इतिहास लिखा जा रहा था।जो परिस्थिति आज उत्पन्न हुई है वहीं के लोगो की जुबानी सुनकर यही लगता है कि गनी सरकार के पतन के पहले तक आम जनता अपनी आबरू महफूज महसूस कर रही थी।बीस सालों में अमेरिका के सैनिकों को भी अपना बलिदान देना पड़ा।वापसी की घोषणा के बाद तालीबानी जिन्न बाहर आया और मजबूत रणनीति के तहत आशा के विपरीत कम समय में ही सत्ता पर काबिज हो गया।समझौता जो भी रहा हो लेकिन बावजूद इसके तालिबान द्वारा बार बार अल्टीमेटम देना भी अमेरिकी सरकार के लिए गंभीर रहा।दो दशकों में गनी सरकार इतनी मजबूत तो होनी ही चाहिए थी किसामाजिक और सामरिक सभी पक्षों से अपनी ताकत का अहसास विश्व को करा सके।जितने समय तक अमेरिका की सरपरस्ती मे अफगान रहा उतने समय तक भावी योजनाओं की रणनीति और उसे खाद पानी देकर जिंदा रखने की भरपूर साहसिक काम तालीबानी आकाओं ने किया जो उनके करीबियों ने उपलब्ध कराई।मतलब साफ है उनका एक ही मकसद रहा कि हर हाल में अफगानिस्तान की सत्ता को बेदखल करना अपनी विचारधारा को जीवित रखा और लगातार अपनी मजबूती के लिए काम किया।मेरे समझ से।गनी सरकार अपने आप को मजबूत मान चुकी थी और भूत काल से अनुभव लेकर भविष्य की संरचना को खींचने को भूल गई।पढ़ने को मिला कि रूपये लेकर भागने के सफाई मे गनी महोदय ने यह भी कहा कि जूता पहनने को मौका नहीं मिला।इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कितने साहसी थे और जनता की रक्षा के लिए कितना सोंच सकते थे ?
आज दशकों से पूरा विश्व आतंकवाद से त्रस्त है और इसी के सफाये  के लिए अफगानिस्तान में मिशन चल रहा था अफगानिस्तान के विकास की धुरी को गति देना और आतंकवाद का सफाया।लेकिन इसमें क्या हासिल किया जा सका ?दो विचारधाराएं सामने आती है।एक समता, स्वतंत्रता
की पोषक और दूसरी, अपने बारूद और बंदूक के बल पर सत्ता कायम करने वाली।अमेरिका ने जितना ही तालीबानी विचारधारा को दबाने का काम किया उतना ही वे लोग मजबूत होते गए।और एक और अवसर पाते ही सिंहासन पर आरूढ़ हो गए। ऐसा नहीं है कि तालीबानी, किसी और देश के नागरिक हैं।वे भी अफगानी ही है लेकिन उनकी विचारधारा 
   बंदूक के बल पर सत्ता हथियाना है।कट्टर शासन चलाना है जिसे आज की आधुनिक पीढी सहध नहीं कर सकती है लेकिन विवश है।इससे साबित होता है कि विचारधाराओं को बंदूक और बारूद से नहीं दबाया जा सकता है। बारूद और बंदूक के बल पर सिंहासन पर आरूढ़ हुए आतंकवादियों का
हाल भी बहुत बुरा  होगा क्योंकि वहाँ के अवाम के विचारों को लम्बे समय तक दबाया नहीं जा सकता है। ऐतिहासिक प्रमाण भी है कि बंदूक के बल पर राजशाही मिट गई, सम्राटों के ताज उतर गए।जनता की भावनाओं और सम्मान के आधार पर गठित राष्ट्र ही मजबूत और टिकाऊ होता है।

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