गाँधी दर्शन

 

गाँधी दर्शन के मानवीय दृष्टिकोण
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आज सम्पूर्ण विश्व में मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें भारत की जनता ने राष्ट्रपिता के नाम से आदर पूर्वक सम्मान दिया
आज उनके विचार सम्पूर्ण विश्व में एक आदर्श के रूप में अपनाए जा रहे हैं।विश्व समाज को सत्य, अहिंसा ओऔर प्रेम का जो संदेश उन्होंने दिया वह मानव समाज को युगों युगों तक
एक निर्मल विचार प्रदान करता रहेगा।महात्मा गांधी का जन्म गुलामी के दिनों में हुआ।उनकी शिक्षा पूरी से परिवार के संसकारों के अनुसार ही हुई और उन्होंने अपने माता रूपी गुरु की शिक्षा का आजीवन पालन किया।उन्होंने शिक्षा ग्रहण करने के बाद जब अपने आजीविका के लिए दक्षिण अफ्रीका की धरती पर पहुंचे और वहाँ रह रहे भारतीयों यानी गिरमिटिया लोगों के बीच रहकर उनकी गुलामी की पीड़ा को देखा तो उनकी अंतरात्मा झकझोर उठी और विदेशी धरती पर रह रहे भारतीयों की पीड़ा दूर करने का बीड़ा उठा लिया।अपमानित होना पड़ा, कड़ा संघर्ष भी करना पड़ा लेकिन शांति के मार्ग पर चलते हुए उन्होंने वहाँ भारतीयों के सम्मान को वापस दिलाने में सफलता पायी।
एक कहावत है कि,"आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास"
महात्मा गांधी के साथ भी ऐसा ही हुआ।वे अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए गये लेकिन वहाँ अपनी माटी के भाईयों की दुर्दशा को सहन नहीं कर सके ।यह उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटना थी।भला अपनो के दुख को एक सहृदय मनुष्य कैसे सह सकता है।उन्होंने कभी भी हिंसक मार्ग नहीं अपनाया क्योंकि वे हिंसा को सबसे बड़ी कमजोरी मानते थे, वे कहते थे कि-अहिंसा महावीरों का अस्त्र है, कायरों का नहीं।अहिंसा में ऐसी शक्ति निहित है, जिसमें मर्यादित परिमाण में सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है।क्योंकि इसमें सहिष्णुता, सहयोग, शील-शालीनता, प्रेम,वात्सल्य और सात्विक भाव निहित है।"
जब भी मानवीय पक्ष की अवहेलना होगी वहाँ वे अहिंसा कहते हैं।जब मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए वे अहिंसा और सत्य की बात करते हैं तब इस विचार परयह ध्यान देना होगा कि माता के सानिन्ध्य में गीता का अध्ययन उनके जीवन में अमृत के समान साबित हुआ।पढाई के लिए बिलायत जाते समय माँ को दिए गए बचन और उनका आजीवन पालन यह साबित करता है कि वे दृढ़ निश्चयी और संकल्प पर अडिग रहने वाले व्यक्ति थे।परपीड़ा से वे बहुत दुखी होते थे।अफ्रीका से वापस आने के बाद जब उन्होंने देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रही काग्रेस के साथ आगे बढने लगे तो उसी समय बिहार प्रांत के चंपारण के किसानों ने चम्पारण के नील की खेती कर रहे किसानों पर अंग्रेजों को जमीदारों की मनमानी को बताया जिसे उन्होंने वहाँ जाकर अपनी आँखों से देखा।पं राजकुमार शुक्ल,जैसे किसानों की कही बात सच दिखी।अंग्रेजों के खिलाफ, किसान हित में शांतिपूर्वक आंदोलन हुआ और किसानों को उनका अधिकार मिला।गाँधी यहीं नहीं रूकते, उन्होंने वहाँ की गंदगी, गरीबी, अशिक्षा, चिकित्सा की कमी आदि तमाम समस्याओं को करीब से देखा तो महीनों रूक गए और लोगों को जागरूक करने का काम किया साथ ही पाठशालाओं की स्थापना की जिससे वहाँ के लोगों को शिक्षा मिल सके।आगे की आजादी की लड़ाई में भी उन्होंने सदैव मानवीय पक्षों के हित को ध्यान में रखा और हिंसा के सदैव विरोधी रहे।यही कारण था कि प्रसिद्ध चौरी चौरा काण्ड के बाद असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया।उनके हृदय में सदैव मानव कल्याण की भावना भरी रहतीं थी।सभी मानव एक समान हैं।सभी के साथ एक व्यवहार होना चाहिए ऐसा वे मानते थे।
उन्होंने हरिजन सेवक के.11 फरवरी 1939.के अंक में लिखा कि-जब तक अहिंसा को खाली नीति के बजाय एक जीवित शक्ति या अटूट ध्येय के रूप में न स्वीकार कर लिया जाय, तब तक मुझ जैसों के लिए, जो अहिंसा के हामी है,, वैधानिक या लोकतंत्रीय शासन एक दूर का स्वप्न ही है।जबकि मैं विश्वव्यापी अहिंसा का पक्षधर हूँ, मेरा प्रयोग हिंदुस्तान तक ही सीमित है।यहाँ उसे सफलता मिली तो संसार उसे बिना किसी प्रयत्न के स्वीकार कर लेगा।मगर इसमें एक बड़ा लेकिन मौजूद है।विध्नों की मुझे चिंता नहीं।घोर अंधकार में भी मेरा विश्वास बड़ा उज्जवल है।" 
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जिनके विचार में  सत्य, अहिंसा और प्रेम की भावना कूट कूट कर भरी हुई है, वह पूरी तरह मानवीय दृष्टिकोण से ओतप्रोत है।  आज जब विश्व में तमाम ऐसी विचारधाएं पनप रही हैं जो मानवता के लिए घातक साबित होंगी, महात्मा गांधी के दर्शन के अध्ययन और उसको विश्व स्तर पर अपनाये जाने की आवश्यकता है।

मोहन पाण्डेय(पत्रकार)
पूर्व निदेशक, गाँधी अध्ययन केन्द्र
श्रीनाथ संस्कृत महाविद्यालय
हाटा, कुशीनगर
 


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