विश्व कविता दिवस पर -

  * *पास तेरे ही आऊॅ कविता**

मन के भाव सुनाऊॅ कविता 
डोर लेख की बाधूॅ कविता। 
अनजाने में बहूॅ कहीं भी 
पास तेरे ही आऊॅ कविता।।
 मन का दर्पण रहे उजाला 
घोर कालिमा उड़ उड़ जाए।
नि:श्वांसों में श्वाॅस भरूॅ नित 
देख सदा मन को नित भाए।।
        विहॅस सदा मैं देखूॅ वनिता 
        पास तेरे ही आऊॅ कविता।।
क्या होगा कल आज पढ़ूं मैं 
गीत सुनहरे आज गढ़ूॅ मैं।
हुए धरा पर मलिन आज जो 
ओज निखारूॅ और मढूॅ मैं।।
    तेज रश्मि ले बढ़ती सविता 
     पास तेरे ही आऊॅ कविता।।
बाॅध छंद और लय में गाऊॅ
मानवता की बात बताऊॅ।
रीति प्रीति के जन जन में 
रहें सुखी जन, मैं सुख पाऊॅ।।
  अनजानी ना रहे ये कविता 
   पास तेरे ही आऊॅ कविता।।

**डॉ मोहन पाण्डेय 'भ्रमर '
 

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